न्यूजलॉन्ड्री का पाक प्रेम: पाकिस्तानी पत्रकार को किया हमदर्दी भरा व्हाट्सएप्प… जो हमारे हाथ लग गया

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न्यूजलॉन्ड्री को पाकिस्तानी टीवी पैनलिस्ट के भारतीय चैनलों पर, खास कर अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी पर, आने और वहाँ कड़े शब्द सुनाए जाने पर काफी दर्द हुआ है। यह बात छिपी नहीं है कि इस वेबसाइट पर, जो हर दिन लोगों द्वारा नकारा जा रहा है, आप आँख मूँद कर भी कहीं उँगली रख दें तो वो अर्नब गोस्वामी से जुड़े किसी लेख पर चली जाएगी।

इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में रहने वाली पत्रकार आरज़ू काज़मी पाकिस्तान का पक्ष रखने के लिए तमाम भारतीय चैनलों पर आती रहती हैं। वस्तुतः, पाकिस्तान के कई पत्रकार, रक्षा विशेषज्ञ आदि भारतीय मीडिया चैनलों पर आ कर भारत-पाकिस्तान से जुड़े मसलों पर पाकिस्तान का पक्ष रखने लगातार आते रहते हैं, और टीवी डिबेट में दिखते रहते हैं। आरज़ू भी ऐसी ही एक पैनलिस्ट हैं।

न्यूजलॉन्ड्री ने यूँ तो अर्नब को निशाना बना कर लगभग हर दिन एक स्टोरी करने का लक्ष्य रखा हुआ है, पर इस बार पाकिस्तान से हमदर्दी दिखाते हुए नई स्टोरी करने की कोशिश की। इसी सिलसिले में अपने आप को भारत से न्यूजलॉन्ड्री का पत्रकार बताते हुए ‘कपिल’ नाम के व्यक्ति ने आरज़ू काज़मी को व्हाट्सएप्प के ज़रिए हमदर्दी जताने, और नीचा दिखाने की भी शब्दावली का प्रयोग करते हुए मैसेज किया।

हाय, मैं भारत से कपिल हूँ। मैं न्यूजलॉन्ड्री में एक रिपोर्टर हूँ। वस्तुतः, मैं अर्नब गोस्वामी जैसे मीडिया चैनल एंकरों को ले कर, आप जैसे लोगों को भारतीय शो पर बुला कर बेवजह धुलाई करने और घृणा फैलाने की बात पर एक खबर बना रहा हूँ। इसलिए, मैं यह जानना चाह रहा था कि क्या वो आपको इसके लिए पैसे देते हैं? और यह भी कि जब आप जानती हैं कि आपको बिना किसी बात के वहाँ धोया जाएगा, तो आप लोग आते ही क्यों हैं? मेरा मतलब है कि आप लोगों को वहाँ जाने के लिए कौन सी बात प्रेरित करती है? क्या आप मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दे सकती हैं?

जाहिर सी बात है कि कोई भी सामान्य बुद्धि-विवेक का व्यक्ति ऐसे शब्दों के निहितार्थ को समझ जाएगा कि उसकी मदद की आड़ में उसे नीचा दिखाने की भी कोशिश की जा रही है। फिर वह मैसेज घूम-फिर कर हमारे पास आ गया।

इसे इस तरह से देखिए कि जैसे किसी पाकिस्तानी शो पर कोई भारतीय जानकार अपना पक्ष रखने जाता है, वैसे ही कोई पाकिस्तानी भी भारतीय शो पर अपने राष्ट्र का पक्ष रखेगा ही। इसमें कोई बुराई नहीं है। डिबेट में आमतौर पर यही होता है और इसी तरह से आम आदमी को दोनों पक्षों को सुनने का मौका मिलता है।

चूँकि बात भारत-पाकिस्तान की होती है तो कभी-कभी वातावरण में बाता-बाती की गर्मी भी होती है, पैनलिस्ट एक-दूसरे पर आक्षेप भी करते हैं, जोर से बोलते भी हैं। यह आज के टीवी डिबेट की सामान्य प्रक्रिया हो गई है।

इस पर न्यूजलॉन्ड्री का पाकिस्तान के पत्रकार से ऐसे सवाल पूछना कि क्या ‘घृणा फैलाने के लिए’ वो पैसे के लिए ऐसी करती हैं, उनकी विचित्र सोच का परिचायक है।

कमाल की बात यह है कि जब उसी शो पर वामपंथियों और शहरी नक्सलियों को, जिसमें जॉन दयाल टाइप के प्राणी शामिल हैं, जब अर्नब उसी अंदाज में सवाल करता है, तब न्यूजलॉन्ड्री उससे पूछने नहीं जाता कि क्या इस बात के उसे पैसे मिलते हैं