पहले डोकलाम, अब लद्दाख- 3 सालों में भारत ने दुनिया को दो बार बता दिया कि चीन सिर्फ भौंकने में expert है

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लगभग एक महीने की तनातनी के पश्चात आखिरकार चीन के तथाकथित पीपुल्स लिबेरेशन आर्मी को मुंह की खानी पड़ी। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर चीन ने मई माह में काफी हद तक भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की थी, जिसका भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब चीन के पास पीछे हटने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है, और 2017 में डोकलाम विवाद के बाद ये दूसरा ऐसा अवसर है जब भारत ने चीन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है।

भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने के पश्चात चीन चार स्थानों पर केन्द्रित था – गलवान वैली क्षेत्र में दो पैट्रोलिंग पॉइंट्स [PP 14 and 15], हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र और पंगोंग त्सो झील क्षेत्र। फिलहाल के लिए चीन ने पंगोंग त्सो क्षेत्र को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों से अपनी सेनाओं को 2 से ढाई किलोमीटर तक पीछे हटा लिया है। दिलचस्प बात तो यह है कि ये निर्णय बुधवार से शुरू होने वाली कमांडर्स के बातचीत से पहले लिया गया है।

चीनी सेना के पीछे हटने की पुष्टि करते हुए चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चुन्यिंग ने बताया की दोनों देश बॉर्डर पर उत्पन्न हुए तनाव को कम करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। हुआ के अनुसार“अभी चीन और भारत के कूटनीतिक और सैन्य प्रशासन ने बॉर्डर पर उमड़े तनाव को कम करने के लिए काफी सकारात्मक बातचीत हुई है”।

फिलहाल, बीजिंग ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि आपसी झड़प किसी बड़े विवाद में तब्दील न हो जाये। लगता है चीन को अब आभास हो चुका है कि भारत से पंगा मोल लेने का अंजाम क्या होता है। इस पूरे प्रकरण की शुरुआत चीन ने ही की थी, क्योंकि उसका प्रमुख उद्देश्य भारत की भूमि पर कब्जा जमा एलएसी के भारतीय क्षेत्र में हो रहे निर्माण को रोकने के लिए दबाव बनाना था। हालांकि, यहाँ पासा उल्टा पड़ गया, और भारत अपने जगह से टस से मस नहीं हुआ है। सैन्य कमांडर्स के बीच होने वाली बातचीत से पहले ही भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि चाहे कुछ हो जाये, एलएसी के भारतीय क्षेत्र में निर्माण पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ेगा, और भारत दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में हो रहे निर्माण पर कोई रोक नहीं लगाएगा।

2017 के बाद एक बार फिर पीपुल्स लिबेरेशन आर्मी को भारत ने एक कड़ा सबक सिखाया है। 2017 में भी पीएलए ने ही हेकड़ी दिखाते हुए भूटान के डोकलाम पठार में गुंडई दिखाई थी। तब भूटान की सीमा की रक्षा के लिए आगे आए भारत ने चीन की गुंडई को न केवल मुंहतोड़ जवाब दिया, बल्कि उसे स्पष्ट संदेश दिया कि चीन की दादागिरी चीन के बाहर कहीं नहीं चलने वाली, कम से कम पड़ोसी देशों में तो बिलकुल नहीं।

उस समय भी 73 दिन की तनातनी के पश्चात चीन को हार मानकर पीछे हटना पड़ा था। लेकिन पूर्वी लद्दाख में अभी जो हुआ है, उस हिसाब से तो डोकलाम में चीन को मिली बेइज्ज़ती तो कुछ भी नहीं है। डोकलाम में उत्पन्न तनाव के दौरान चीन कम से कम 73 दिन टिका तो था, पर पूर्वी लद्दाख में उत्पन्न तनाव में एक महीने से भी कम समय में चीन को बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा था। सच कहें तो पूर्वी लद्दाख के विवाद ने सिद्ध किया कि चीन एक कागज़ी शेर से अधिक कुछ भी नहीं रहा है।

इसके अलावा डोकलाम के तनाव के बीच चीन का सरकारी मीडिया और सोश्ल मीडिया काफी सक्रिय था, जहां अक्सर 1962 दोहराने की बातें होती थी। पर इस बार चीनी मीडिया अपने स्वभाव के ठीक विपरीत काफी सतर्क थी, और कुछ एक एडिटोरियल्स छोड़कर उसने ऐसा कुछ भी नहीं छापा या प्रसारित किया, जो अंत में चीन की ही भद्द पिटवाए। उदाहरण के लिए चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने भारत चीन विवाद को लेकर वीबो सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म पर  ‘China India border confrontation’  ट्रेंड भी डिलीट करवाया, जिसपर 3 करोड़ से अधिक हिट्स आए थे।

ग्लोबल टाइम्स ने निस्संदेह चीन की छवि को बचाने का भरसक प्रयास किया था, पर उसकी कवरेज ने उल्टे चीन की पोल खोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। चीन की साइट thepaper.cn में लिखे एक लेख में चीनी सैन्य विशेषज्ञ हुआंग गुओज़्ही के अनुसार, “इस समय विश्व में पठार और पहाड़ी युद्ध  शैली में यदि कोई वास्तव में निपुण है, तो वो न अमेरिका है, न रूस और न ही कोई यूरोपीय देश, बल्कि भारत है”।

चीनी विशेषज्ञ अपने बात में कहीं भी गलत नहीं है, क्योंकि चाहे 1962 में रेजांग ला का युद्ध हो, या फिर 1965 का हाजी पीर युद्ध, या फिर 1999 में पाकिस्तान से लड़ा कार्गिल युद्ध ही क्यों न हो, भारतीय सेना ने सीमित संसाधनों में भी शत्रु को नाकों चने चबवाये हैं। पीएलए ने इसलिए भी पूर्वी लद्दाख से अपनी सेना को पीछे खींचा है, क्योंकि वो नहीं चाहता कि उनके सैनिकों की तैयारी की पोल दुनिया के सामने खुले। अधिकांश चीनी कमांडरों ने युद्ध का मुंह नहीं देखा, और जिन्होने देखा भी होगा, वो अब कुछ सालों में सेवानिर्वृत्त भी होने वाले हैं।

चीन के वन चाइल्ड पॉलिसी के कारण उसकी सेना में ऐसे लोग भरे हैं, जिनसे शायद मक्खी भी ना मारी जाए, दुश्मन को हराना तो बहुत दूर की बात। ऐसे में ये बिगड़ैल चीनी सैनिक हमारे भारतीय जवानों के सामने टिक नहीं पाएंगे। स्पष्ट है पिछले तीन सालों में भारत ने बता दिया है कि चीन एक कागजी शेर से ज़्यादा कुछ नहीं है, और उसकी पीपुल्स लिबेरेशन आर्मी सिर्फ बातों के शेर है, जिन्हें 2017 में डोकलाम और अब पूर्वी लद्दाख में बिना एक गोली चलाये भारतीय सेना ने पटक पटक के धोया