कारगिल युद्ध: जब सेना ने हासिल कर ली थी मश्कोह घाटी की अंतिम पोस्ट, जानें कैसे मिली थी फतह

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पाकिस्तान ने 1999 में भारत को धोखा दिया था। एक समझौते का उल्लंघन करके ये धोखा दिया गया था। शिमला समझौते के तहत भारत-पाक के बीच 1972 में एग्रीमेंट हुआ था।

कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के सामने दुश्मन हर मोर्चे पर पस्त नजर आए थे। सेना के शौर्य को देखकर पाकिस्तानी सेना के जवान थर-थर कांपते थे। सेना के बलिदान और साहस के बदौलत ही भारत 1999 में युद्ध जीत सका था। इस युद्ध में सेना ने कई ऑपरेशन लॉन्च किए थे जिसके बाद यह बड़ी जीत हासिल हुई थी। ऐसे ही एक ऑपरेशन में सेना ने द्रास की मश्कोह घाटी की अंतिम पोस्ट 8 जुलाई को फतह की थी। इस फतह का एक-एक लम्हा हमारे वीर सपूतों की बहादुरी को प्रदर्शित करता है।

लगभग 60 दिनों तक चले कारगिल युद्ध के दौरान 3 मई से लेकर 8 जुलाई तक मश्कोह घाटी की सभी पोस्टें हासिल कर ली गईं थीं। ये वही जगह है जहां से पूर्व पाक राष्ट्रपति और कारगिल युद्ध के समय सेना अध्यक्ष जनरल परवेज मुर्शरफ ने खुद अपने आतंकियों को युद्ध के लिए निर्देश दिए थे।

पाकिस्तानी सैनिकों ने भी यहीं डेरा डाला था। पाकिस्तान ने इसे अपने महत्वपूर्ण पोस्ट के रूप में चुना था। भारत इस पोस्ट को हर कीमत पर हासिल करना चाहता था। पाक सेना ने यहां पर दर्जनों बंकर बनाये थे। उन्हीं बंकरों में रहकर जंग लड़ी थी।

रामनगर तहसील के अमरोह गांव निवासी सेना मेडल विजेता (रिटायर्ड) सूबेदार मेजर कौशल कुमार शर्मा के मुताबिक कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में बिना आराम किए दिन रात जूझने के बाद सेना ने इस पोस्ट को हासिल कर लिया था। इस दौरान राइफलमैन संजय का पराक्रम देख दुश्मन कांप रहे थे।

मालूम हो कि पाकिस्तान ने 1999 में भारत को धोखा दिया था। एक समझौते का उल्लंघन करके ये धोखा दिया गया था। शिमला समझौते के तहत भारत-पाक के बीच 1972 में एग्रीमेंट हुआ था। पर तत्कालीन पाक सेना के जनरल परवेज मुशर्रफ ने सैनिकों को कारगिल के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों में भेजकर कब्जा करवा दिया था।