कश्मीर से क्यों वापस बुलाए गए 10 हजार जवान? ये है असली वजह

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नई दिल्ली | जम्मू-कश्मीर पर पिछले सप्ताह एक सुरक्षा समीक्षा के तहत सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश से 10,000 सैनिकों की वापसी का आदेश दिया। इस कदम को कश्मीर घाटी में केंद्र की पहुंचने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। समीक्षा का आदेश गृह मंत्री अमित शाह ने तब दिया, जब वह इस महीने की शुरुआत में गुरुग्राम के अस्पताल में भर्ती थे।

सुरक्षा की समीक्षा और फिर केंद्रीय बलों की लगभग 100 कंपनियों की वापसी का फैसला, उस समय के आसपास लिया गया है, जब सरकार जम्मू-कश्मीर में विकास संबंधी गतिविधियों को तेज कर रही है। इसके साथ ही, सरकार ने वरिष्ठ नेता मनोज सिन्हा को केंद्र शासित राज्य का उप-राज्यपाल नियुक्त किया है।

इस मुद्दे पर एक अधिकारी ने बताया कि एक के बाद एक, दो घटनाक्रमों का समय केवल एक संयोग नहीं है। यह जम्मू-कश्मीर के लोगों को संदेश देने के लिए लिया गया फैसला है कि सरकार उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए तैयार है। वहीं, दूसरी ओर इस फैसले के पीछे एक नजरिया यह भी है कि अभी तक सीमा के पार प्रशिक्षित लगभग 200 कट्टर आतंकवादियों को हमले करने से रोकने के लिए केंद्र शासित प्रदेश में कई सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।

केंद्र सरकार ने लिया फैसला

पिछले सप्ताह हुई सुरक्षा समीक्षा में यह स्वीकार्यता निकलकर सामने आई कि वहां कुछ जवानों की संख्या में कमी की जा सकती है, क्योंकि पिछले एक साल में कई शीर्ष आतंकवादी कमांडरों को ढेर किया जा चुका है। सुरक्षा अधिकारियों ने यह भी दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में कुछ सुधार हुए हैं कि कैसे जनता आतंकवाद विरोधी अभियानों का जवाब देने के लिए आगे आ रही है।

इसके बाद, सुरक्षा अधिकारियों की एक टीम ने 15 अगस्त को फील्ड कमांडरों के साथ बातचीत करने और टुकड़ी की वापसी के लिए जमीनी कार्य करने के लिए जम्मू-कश्मीर की यात्रा की थी। टीम के वहां पहुंचने से कुछ घंटे पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में लाल किले से देश को संबोधित करते हुए पिछला साल जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्रों की विकास यात्रा के लिए ‘एक बहुत महत्वपूर्ण मील का पत्थर’ बताया था और विधानसभा चुनावों के बारे में बात की थी। लाल किले से पीएम मोदी ने कहा था, ‘जम्मू-कश्मीर में डिलिमिटेशन का काम चल रहा है। हम चाहते हैं कि यह प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी हो, ताकि वहां चुनाव हो सके।’

इस प्रक्रिया का हिस्सा रहे एक शीर्ष पुलिस अधिकारी ने हमारे सहयोगी अखबार ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ को बताया, ‘यह महसूस किया गया कि जम्मू-कश्मीर में जिस संख्या में बल की तैनाती की गई है, वह मौजूदा सुरक्षा स्थिति के तहत अनुपातहीन हो सकती है। इससे स्थानीय लोगों को असुविधा हो सकती है।’ वहीं, शीर्ष सेना कमांडरों के अलावा, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और अन्य केंद्रीय बलों के शीर्ष अधिकारी समीक्षा का हिस्सा थे।