भारत और अमेरिका की सफल सैन्य डील को होते देख चीन हुआ बेहाल

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हाल ही में अपने रिश्तों को एक नया आयाम देते हुए भारत और अमेरिका ने BECA सैन्य डील पर हस्ताक्षर की ओर अपने कदम बढ़ाए हैं। BECA रक्षा सौदे पर हस्ताक्षर करने से भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहायता को न केवल बल मिलेगा अपितु अमेरिका, भारत के साथ हर स्थिति में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा। लेकिन इस सौदे से चीन को ज़बरदस्त जलन हुई है, और इसे जगजाहिर करने में वह कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।

हाल ही में भारत ने यह स्पष्ट किया है की 2+2 Dialogue के अंतर्गत जब अमेरिका के रक्षा मंत्री मार्क एसपर और विदेश मंत्री माइक पोम्पियो जब भारत के दौरे पर आएंगे, तो वह प्रसिद्ध BECA डील, यानि Basic Exchange and Cooperation Agreement पर भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर के साथ मिलकर हस्ताक्षर कर सकते हैं।

इस रक्षा डील से भारत को क्या लाभ मिलेगा? BECA डील रणनीतिक तौर पर भारत की रक्षा नीति के लिए बेहद हितकारी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस डील पर हस्ताक्षर करने से भारत को अमेरिका के अत्याधुनिक Geospatial Maps की सुविधा प्राप्त होगी। इस मैप से न केवल शत्रुओं के आक्रमण की नीति और बेहतर तरीके से समझ में आएगी, बल्कि इन मैप्स के बल पर भारत अपनी रक्षा के लिए क्रूज़ एवं बैलिस्टिक मिसाइल्स को सटीक तरह से फायर भी कर सकता है।

सच कहें तो ये BECA समझौता भारत और अमेरिका के बीच की रणनीतिक साझेदारी के अंतर्गत किए गए कई अहम रक्षा समझौतों का ही एक विस्तार है। इससे पहले वर्ष 2018 में अमेरिका और भारत के बीच इसी प्रकार की बैठक में COMCASA को प्रारम्भ करने पर सहमति जताई गयी थी। यह दस वर्षों के लिए वैध है, और इसके अंतर्गत खुफिया कम्युनिकेशन के लिए काम में आने वाले अमेरिकी प्लैटफ़ार्म जैसे सी17, सी130 एवं पी81 के उपयोग की स्वतन्त्रता मिलेगी। COMCASA अमेरिका के Communication and Information on Security Memorandum of Agreement यानि CISMOA का ही भारत केन्द्रित वर्जन है।

लेकिन यह साझेदारी केवल ट्रम्प प्रशासन तक ही सीमित नहीं रही। जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष थे, तब भी भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहायता काफी मजबूत थी। सैन्य लॉजिस्टिक्स के आदान प्रदान को लेकर भारत ने 2016 में LEMOA समझौते पर भी हस्ताक्षर किए थे, जिससे दोनों देशों के बीच मिलिटरी लॉजिस्टिक्स का आदान प्रदान और अधिक सुगम होगा। इन दोनों समझौतों के बाद ये तीसरा समझौता भारत को अमेरिका का सबसे उपयोगी और महत्वपूर्ण साझीदार के रूप में पहचान दिलाएगा। जो कि अब तक NATO के देशो तक ही सीमित था।

BECA के तैयारियों को लेकर भारतीय थलसेना के उपाध्यक्ष, लेफ्टिनेंट जनरल एसके सैनी ने अमेरिकी सेना के 25वीं इनफेन्ट्री डिविजन लाइटनिंग अकादेमी का दौरा भी किया, जहां उन्होंने अमेरिकी सेना के अफसरों से रक्षा क्षेत्र में सहयोग और सहायता के विषय पर लंबी बातचीत की, जहां पर भारत ने अमेरिका के साथ इंडो पैसिफिक क्षेत्र में बेहतर साझेदारी की आशा भी जताई।

परंतु इस निर्णय से अगर किसी को सबसे अधिक मिर्ची लगी है, तो वह है चीन। इंडो पैसिफिक क्षेत्र पर वर्चस्व जमाने के सपने पाल रहे चीन के लिए अमेरिका और भारत के बीच मजबूत रिश्ते फूटी आँख नहीं सुहाते। चीन की यह जलन एक बार फिर उसके मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने जगजाहिर की। ग्लोबल टाइम्स ने हाल ही में एक लेख छापा, जिसका शीर्षक था, “हिन्द महासागर में वाशिंगटन के युद्ध नाच में हिस्सा लेना चाहती है नई दिल्ली”

इस लेख में लिउ ज़्होंगयी के हवाले से लिखा गया, “ अमेरिका के लिए नई नौ सैनिक युद्ध अभ्यास इंडो पैसिफिक रणनीति के हिसाब से बहुत हितकारी है। जैसे जैसे अमेरिका के चुनाव पास आ रहे हैं, यह रणनीतियाँ डोनाल्ड ट्रम्प के लिए चुनावी तौर पर काफी लाभकारी सिद्ध होंगी। ऑस्ट्रेलिया और जापान भी इसीलिए इस अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं ताकि वह चीन को चुनौती दे सके। QUAD की चीन के विरुद्ध एक ‘लोकतान्त्रिक सुरक्षा मोर्चा’ खड़ा करने की अभिलाषा के विरुद्ध, चीन को सतर्कता बरतनी चाहिए। साथ ही  चारों ने पहले ही चीन के विरुद्ध सैन्य समझौता कर लिया है। ऐसी सैन्य सहायता से NATO जैसा संगठन नहीं बनेगा, परंतु चीन को हिन्द महासागर में हर संकट के लिए तैयार रहना होगा।”

इसी को कहते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। चीन की औपनिवेशिक मानसिकता से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है, लेकिन ग्लोबल टाइम्स के इस लेख से वह जताना चाहता है मानो उसके पीछे दुनिया हाथ धोकर पड़ी हुई है। हिन्द महासागर में जिस प्रकार से चीन भारत को घेरना चाहता है, उसके मुक़ाबले भारत ने मालाबार युद्ध अभ्यास के जरिये चीन को करारा जवाब दिया है, जिसमें अब ऑस्ट्रेलिया भी अमेरिका और जापान के साथ आधिकारिक तौर पर शामिल होगा। इसी QUAD समूह अभ्यास की ओर चीन ने अपने ग्लोबल टाइम्स के लेख में इशारा भी किया है।

भारत और अमेरिका के बीच मजबूत रक्षा सम्बन्धों का अर्थ है कि अब चीन की खैर नहीं। जिस प्रकार से रक्षा समझौते में भारत और अमेरिका ने BECA डील को स्वीकृति देकर चीन के विरुद्ध मोर्चा सशक्त किया है, उससे चीन को ज़बरदस्त मिर्ची लगी है, जो स्वाभाविक भी है, क्योंकि हिन्द महासागर हो या फिर इंडो पैसिफिक क्षेत्र, अब चीन की दादागिरी और नहीं चलेगी।