“नहीं मिले अरब के दिनार, तो ढह गयी खलीफ़ा की मिनार” तुर्की के व्यापारी अरब देशों से मिन्नतें मांगने लगे हैं

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पिछले दिनों ही सऊदी अरब ने तुर्की पर आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान किया था, जिसके बाद सऊदी में अब तुर्की में बने उत्पादों पर शत प्रतिशत बैन लग गया है। लॉकडाउन के कारण पहले ही सुस्त पड़ी तुर्की की इकॉनमी पर इसका बेहद नकारात्मक असर पड़ा है और तुर्की के व्यापारियों को बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है। शायद यही कारण है कि अब तुर्की के व्यापारियों ने अरब देशों से सभी विवाद सुलझाने की अपील की है। विडम्बना यह है कि जो तुर्की इस्लामिक दुनिया से अरब देशों का वर्चस्व समाप्त कर यहाँ अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है, वह सऊदी के आर्थिक प्रतिबंधों को दो हफ्ते तक नहीं झेल पाया।

बता दें पिछले हफ्ते ही gulf news ने यह रिपोर्ट किया था कि सऊदी अरब ने अब अपने नागरिकों को किसी भी तुर्की उत्पाद की खरीद करने से साफ इंकार किया है। गल्फ न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, “सऊदी अरब के चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष ने हाल ही में ट्विटर पर किए गए पोस्ट में तुर्की की हर वस्तु के बहिष्कार की मांग की है, चाहे वह आयात हो, निवेश हो, या फिर पर्यटन ही क्यों न हो, और साथ ही में ये भी कहा कि ऐसा करना हर सऊदी नागरिक का कर्तव्य है।” इसके बाद यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि बाकी के अरब देश भी सऊदी के पदचिह्नों पर चलते हुए तुर्की के उत्पादों पर बैन लगा सकते हैं।

इस प्रतिबंध के बाद अब तुर्की के व्यापारियों में हड़कंप सा मच गया है। सऊदी अरब के प्रतिबंधों के महज़ एक हफ्ते के अंदर ही तुर्की के बिजनेस ग्रुप्स, टेक्सटाइल एक्स्पोर्टर्स और ठेकेदारों ने सऊदी अरब को एक पत्र लिखा है जिसके मुताबिक “दोनों देशो के बीच आधिकारिक और गैर-आधिकारिक तरीकों से व्यापार रोकने से हमारे आर्थिक रिश्तों और अर्थव्यवस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, हमें मिलकर अपने मतभेद सुलझा लेने चाहिए”। इस पत्र से समझा जा सकता है कि एर्दोगन के इन कदमों के कारण देश के व्यापारियों पर कितना नकारात्मक असर पड़ रहा है।

राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की लचर नीतियों के कारण इसी वर्ष अगस्त तक तुर्की की मुद्रा लीरा की कीमत में अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले 20 प्रतिशत से ज़्यादा गिरावट देखने को मिल चुकी है, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। देश में महंगाई बढ़ गयी है और बेरोजगारी रिकॉर्ड 12 प्रतिशत तक जा पहुंची है। इसी बीच इम्पोर्ट बढ़ने और GDP घटने से तुर्की का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम होता जा रहा है। इस साल कोरोना के बाद से ही तुर्की के सरकारी बैंक ने मंदी से बचने के लिए कई उपाय किए थे। उदाहरण के लिए बाज़ार में मांग बढ़ाने के लिए बैंकों ने सस्ते दरों पर कर्ज़ देना शुरू किया। मई में ब्याज दर को 12 प्रतिशत से घटाकर 8.25 प्रतिशत कर दिया गया था। इसके बाद पिछले तीन महीनों के दौरान तुर्की के consumer debt में 40 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला। ज़्यादा कर्ज़ दिये जाने की वजह से मार्केट में मांग बढ़ गयी, जिसके कारण महंगाई बढ़ गयी। जुलाई में तुर्की में महंगाई दर लगभग 12 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी। इस वर्ष लीरा की गिरती कीमतों को संभालने के लिए देश का केंद्रीय बैंक 65 बिलियन डॉलर खर्च कर चुका है, लेकिन बढ़े हुए इम्पोर्ट्स और कम हुई GDP लीरा के दामों में कोई सुधार नहीं आने दे रही है। इसके अलावा कम होते विदेशी मुद्रा भंडार से तुर्की की आर्थिक हालत और ज़्यादा खराब हो गयी है।

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन दोबारा खलीफा बनने के सपने देखने के चक्कर में अपने देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने में लगे हैं, जिसका खामियाजा अब तुर्की के आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। एर्दोगन को समझ लेना चाहिए कि आधुनिक विश्व धार्मिक मूल्यों के आधार पर नहीं, बल्कि आपसी हितों और आर्थिक रिश्तों के आधार पर आगे बढ़ता है। अपनी किए पापों की सज़ा एर्दोगन अपने करोड़ों देशवासियों को दे रहे हैं और अगर उन्हें जल्द ही उनके पद से नहीं हटाया गया तो इस देश का अगला ईरान बनना तय है।