अभी अभीः किसान के नाम पर दिल्ली में हल्ला मचाने वाले कौन है? खडे हो रहे बडे सवाल

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नई दिल्ली. 8 हफ्तों का समय गुजर चुका है, लेकिन दिल्ली की सरहदों पर आंदोलन कर रहे किसानों का विरोध थमा नहीं है. इन किसानों में नए कृषि कानूनों को लेकर नाराजगी है. हालांकि, सरकार और किसान 9 बार आमने-सामने बैठकर बात कर चुके हैं, लेकिन सबकुछ बेनतीजा रहा. एक तरफ सरकार कानून पर बात करने के लिए तैयार हैं और उनमें संशोधन की बात कह रही है. वहीं, दूसरी तरफ किसान इन कानूनों को वापस लिए जाने की मांग पर अड़े हुए हैं.

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इन प्रदर्शनों की वजह से सड़कें जाम हैं, लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. इन बातों को ध्यान में रखकर सुप्रीम कोर्ट ने मुद्दे को लेकर एक आदेश जारी किया. अपने इस आदेश में अदालत ने इन तीनों कानूनों के लागू होने पर रोक लगा दी और मामले के निपटारे के लिए एक समिति गठित कर दी. अब किसानों ने इस समिति को नकार दिया और साफ कर दिया कि कानून वापसी के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

इससे एक चीज पता चल रही है कि प्रदर्शन कर रहे लोग किसी समाधान तक पहुंचना ही नहीं चाहते. ऐसा लगता है कि वे इस गतिरोध और अराजक हालात को जारी रखना चाह रहे हैं. ऐसा पता चल रहा है कि आंदोलनकारी पहले से मौजूद कृषि व्यवस्था से खुश हैं और इसमें कोई बदलाव नहीं चाहते हैं. इससे आंदोलनकारियों पर सवाल उठता है. क्या वाकई ये प्रदर्शन खेत या किसान के लिए है भी या नहीं?

ये 12 कारण किसान आंदोलन पर सवाल उठाते हैं-

1- इस आंदोलन में शामिल कई लोग पेशेवर कार्यकर्ता हैं, जो नियमित रूप से केंद्र सरकार के खिलाफ जीएसटी, सर्जिकल स्ट्राइक, 370, राम मंदिर, नोटबंदी समेत कई मुद्दों पर नारे लगाते नजर आते हैं.

2- इनकी मांगों में कृषि कानूनों को वापस लेना केवल मुद्दों में से एक है. इनके दूसरे मुद्दों का खेत या किसानों से कोई लेना देना नहीं है. इस दौरान एक बड़ा मुद्दा नक्सल कार्यकर्ता और दंगाइयों की रिहाई है.

3- इस्लामिक आतंक और नक्सलवाद से संबंध रखने वाले उमर खालिद, शर्जील इमाम, वरवर राव और जैसे कई लोगों के पोस्टर आंदोलन स्थल पर नजर आते हैं. इनमें से कई लोग ऐसे कार्यकर्ताओं के रूप में नहीं जाने जाते, जो किसानों के लिए काम कर रहे हों.

4- इस बवाल में शामिल कई लोग पंजाब से हैं. ये वो अमीर किसान हैं, जो अढ़त का काम करते हैं. आढ़ती दरअसल मंडी में बिचौलिए होते हैं, जो छोटे किसानों से कम कीमत पर फसल खरीदकर ऊंचे दामों पर बेचते हैं. 1991 में राव सरकार ने आर्थिक बदलावों की घोषणा की थी. तब से अब तक अलग-अलग सेक्टर्स में कई बदलाव हुए. इनमें से सभी बदलावों का विरोध उन लोगों ने किया, जो पुरानी व्यवस्था के लाभार्थी थे. मौजूदा आंदोलन भी इसका उदाहरण है. यह किसानों का विरोध नहीं है, बल्कि आढ़तियों का आंदोलन है, जो कृषि क्षेत्र को आजाद नहीं होने देना चाहते.

5- ऑल इंडिया किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी के संयोजक सरदार वीएम सिंह थे. जिनके नाम करोड़ों की घोषिथ संपत्ति है. उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर दो लोकसभा चुनाव भी लड़े थे. हालांकि, जब उन्होंने सरकार से बातचीत की पेशकश की थी, तो उन्हें संयोजक के पद से हटा दिया गया था.

6- देश के ज्यादातर किसानों और किसान संगठनों ने इन कानूनों के प्रति समर्थन जताया है. उन्होंने बयान जारी किए हैं कि ये कानून भारत के किसानों के हक में हैं.

7- सबूत उस तरफ इशारा करते हैं कि इस आंदोलन को कई उग्रवादी संगठनों से आर्थिक मदद मिल रही है. ये वो संगठन हैं, जो खालिस्तान की मांग कर रहे हैं और भारत में बैन हैं. प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान और खालिस्तान समर्थित नारे लगाए और आंदोलन को नापाक इरादों वाले लोगों ने हाईजैक कर लिया. भारत सरकार ने इस बात को सुप्रीम कोर्ट के सामने भी कहा है.

8- धरना स्थल पर मौजूद सुविधाएं मुश्किल से अपनी जरूरतें पूरी करने वाले एक औसत भारतीय किसान के जीवन का मजाक उड़ाती हैं. जिम, फुट मसाज पार्लर और पिज्जा स्टॉल एक किसान के असल जीवन से उलट हैं. इससे साफ होता है कि ये लोग एक औसत भारतीय किसान का प्रतिनिधित्व तो नहीं करते.

9- सरकार बात करने तैयार है और सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दखल दे दिया है और एक समिति गठित कर दी है. इसके बाद भी धरना देने वालों ने तंबू हटाने से मना कर दिया है. एक ओर किसान सरकार के प्रतिनिधियों से बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर 26 जनवरी को ट्रैक्टर के साथ दिल्ली कूच करने की बात कह रहे हैं. इसका मकसद जश्न के दिन अराजकता फैलाना और राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाना लगता है. इस विरोध के पीछे मौजूद ताकतों ने ऐसा ही अमेरिकी राष्ट्रपति की विजिट पर किया था और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे शुरू करा दिए थे.

10- कई किसान समूह अलग-अलग वाम दलों से संबंधित हैं और किसानों के हक का मुखौटा पहनकर काम कर रहे हैं. ऑल इंडिया किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी, ऑल इंडिया किसान सभा और ऑल इंडिया किसान मजदूर सभा जैसे संगठनों का एक संघ है. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि धरना स्थल पर वाम दलों के झंडे क्यों नजर आते हैं.

11- केंद्र सरकार को बदनाम करने के लिए इस प्रदर्शन को मौकापरस्त विपक्षी दलों का समर्थन है. महामारी के दौरान गरीब अप्रवासियों के 5 दिन खाना नहीं खिला सके अरविंद केजरीवाल अब अपने नेताओं को किसान आंदोलन में सेवादारी के लिए भेज रहे हैं.

12- सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी तैयार की, जिसमें से भूपेंद्र सिंह मान बाहर हो गए. उन्होंने कहा कि वे पंजाब और किसानों के हक के साथ समझौता नहीं कर सकते. धरना देने वालों का यह समूह पहले सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, लेकिन बाद में जब कोर्ट ने समिति गठित की, तो उन्होंने सदस्य को कमेटी छोड़ने के लिए मजबूर किया.